• Pooja Jain

बावळि बूच

हो नहीं सकता कि जिंदगी ने आपको गर्दन के बल जमीं पर न दे मारा हो और उखड़ती सांस में सुकून का एक पल सपना बन गया हो।

ये शब्द लिखें हैं लेखक सुनील कुमार की पुस्तक "बावळि बूच" के बैक कवर पर, कितनी सच्चाई है ना इन शब्दों में।


आगे बढ़ने से पहले जिनको नहीं पता उनके लिए मैं पहले इस बावळि बूच शब्द का मतलब बताना चाहूंगी , इसका मतलब होता है "मूर्ख", जो लोग हरियाणवी से वाकिफ हैं उन्हें ये जरूर पता होगा। इसके साथ साथ हरियाणवी लोगों की एक और आदत , किसी को अगर कुछ समझ न आये तो वो सबसे पहले कहेगा " जमा बावळि बूच है मेरे यार तूं बी " या "बावला हो रा सै के" , ये दोस्तों के बीच जितने बोले जाए मतलब वो उतने ही "पक्के याड़ी" यानी दोस्त हैं।


हरियाणवी लोग एक और बात पर या कावत पर भी बहुत विश्वास रखते हैं "पढ़े हुए से ज्यादा कढ़े हुए होना " ,यानी की किताबी ज्ञान की बजाय वास्तविक ज्ञान को ज्यादा अहमियत देते हैं।


कुछ ऐसी ही कहानी है "बावळि बूच " के नायक अंतक की। अंतक जो अंत तक लड़ा। ग्रेजुएशन के बाद सरकारी नौकरी न मिलने के कारण और दो साल खाली बैठने वाली झुंझलाहट से परेशान अंतक एक दिन निकल पड़ता है "सीनियर मीडिया हाउस " में टेलीविज़न जॉर्नलिस्म का कोर्स करने नॉएडा।


जहाँ पहुँचते ही उसे समझ आ जाता की , जिस अँधेरे में उसने तीर चलाया था वो दरअसल उल्टा घूमकर उसी को लग चूका है और वो एक झांसा देने वाले और दिमाग को कब्जे में कर ले ऐसे विज्ञापन का और रिसेप्शन पर बैठी सीखी पढ़ी परामर्श देने वाली की मीठी बातों का शिकार हो चूका है , जैसा की आजकल हो ही रहा है; बरगलाने वाले विज्ञापनों से।


अब भारी भरकम फीस भरने के बाद घरवापसी का तो सवाल ही नहीं , तो सोचा अब जो होता है देखतें हैं , और शुरू होता है 13 भावी रिपोटेर्स के साथ चैनल S1 का पहला बैच। ठगी, दोस्ती, दुश्मनी, चालबाजी , जालसाज़ी और खबरों की भूखी मीडिया किस तरह न्यूज़ दिखाती नहीं बनाती है ये बिलकुल साफ़ तरीके से दिखाया गया है।


अपने हुनर और काबिलियत के बल पर अंतक इस भूलभुल्लैया से बहार निकलता है, कौन कौन उसका साथ देता है ,और कैसे उसका शौकिया शुरू किया लेखन उसको आगे का रास्ता और मंजिल दिलाता है ये जानने के लिए पढ़िए "बावळि बूच " , कुछ पंक्तिया जो आपको मिडिया की सच्चाई से वाकिफ कराएंगी वो ये हैं:


"वाहियात और सक्सेसफुल पत्रकारों में एक ही समानता होती है - मिल बांटकर खाना।चतुर लोग जानते हैं की अगर अकेले खाया तो बाकी जमात निपटा देगी। इसलिए मीडिया जगत की हस्तियां एक दुसरे का ध्यान रखती हैं। भाईचारे क लिए नहीं ,बल्कि खुद की गर्दन तनी रहे, इसलिए। "

"लोगों को ज्ञान पसंद नहीं , लेकिन फिर भी कलयुग में उसकी बहुत जरूरत है। शायद इस दौर में सबसे ज्यादा जरुरत है। जिस ढर्रे पर आज की मीडिया लिखती है उससे लोग भागते हैं। पर तरीका ढर्रे से जुदा हो तो शायद बात बन जाए। "


"वही लोग मीडिया की इस दुनिया में आगे बढ़ेंगे जो या तो झूठी-सच्ची तारीफ़ के कसीदे पढ़ने में अव्वल हैं या फिर घाग हैं। मतलब चुप रहो और मौका मिलते ही बाप के सिर ऊपर से भी चौका मार दो। पत्रकारिता नाम की चिड़िया मात्र अफवाह है। वह न थी ना ही है। "


इसके साथ साथ बहुत से प्रेरित करने वाली और रिश्तों को बयां करती पंक्तियाँ भी मिलेंगी।


कहानी मुझे क्यों पसंद आयी तो उसका सीधा सा जवाब ये होगा की शुरुआत में ठगी का आभास होते हुए , ये पता होते हुए भी की शायद डिग्री भी नहीं मिले उसके बावजूद वह पीछे नहीं हटा और अपनी मंज़िल को पाया बिना उस मीडिया हाउस के कॉन्ट्रैक्ट और कोई नियम कायदा तोड़े।


कहानी का अंत ऐसा है जो आपको रुलाएगा , झटका देगा और बताएगा की खुद पर भरोसा हो तो कोई भी जंग लड़ी जा सकती है और जीती जा सकती है। अलग अलग जगह से आये batchmates और सिर्फ कहने भर को टीचर्स को मिलाकर किरदार बहुत हैं लेकिन कुछ अपवादों को छोड़कर बेमतलब नहीं लगते। ये आपको हसांएगे , रुलायेंगे , कटाक्ष करेंगे और सोचने को मजबूर भी।


कसावट की गुंजाईश रखते हुए भी कहानी अच्छी है, रिसर्च भी। पढ़ लीजिये निराश नहीं होंगे और मीडिया का अंदरूनी चेहरा भी काफी हद तक देख पाएंगे।


"दिल की पुकार का पीछा करने की वजह से घर - खानदान और लगभग सभी ने अंतक को मूर्ख यानी बावळि बूच समझा , लेकिन ऐसा क्या किया उसने की वो एक नामी मीडिया हाउस का चीफ़ बन गया ,जहाँ पहुँचने में बरस लगते हैं वहां कैसे एक बावळी बूच नवागंतुक पहुंच गया ये देखने के लिए लगाइये चैनल "बावळी बूच" , रिपोर्टर bookflixing के साथ।



लेखक को उसके पहले सफल प्रयास के लिए बधाई और आगे के लिए शुभकामनाएं।


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