• Pooja Jain

बहेलिए

Updated: Jul 21, 2020

स्त्रियाँ जो मिटाना चाहती हैं अपने माथे पर लिखी मूर्खता किताबों में उनके नाम दर्ज चुटकुलों, और इस चलन को भी जो कहता है, ‘‘यह तुम्हारे मतलब की बात नहीं’’ मगर सिमट जाती हैं मिटाने में कपड़ों पर लगे दाग, चेहरों पर लगे दाग, और चुनरी में लगे दागों को, स्त्रियाँ, जो होना चाहती हैं खड़ी चैपालों, पान ठेलों और चाय की गुमटियों पर करना चाहती हैं बहस और निकालना चाहती हैं निष्कर्ष मगर सिमट जाती हैं निकालने में लाली-लिपस्टिक-कपड़ों और ज़ेवरों के दोष, कौन हैं ये स्त्रियाँ? क्या ये सदियों से ऐसी ही थीं? या बना दी गईं? अगर बना दी गईं तो बदलेंगी कैसे? बदलेंगी....मगर सिर्फ़ तब जब वे ख़ुद चाहेंगी बदलना सिमटना छोड़कर। सवाल तो यह है कि क्या स्त्री खुद अपनी मर्ज़ी से सिमटकर रह जाती है या फिर उसका परिवार, परिवेश, समाज और समाज के बहेलिए उसे सिमटने पर विवश करते हैं।

ये पंक्तिया हैं पुस्तक बहेलिये से, जो हमे बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती हैं।


अपनी पहली ही किताब "ऐसी वैसी औरत" और उसके बाद अपने माँ बनने के अनुभवों से संजोयी हुई किताब मैं से माँ तक कि कामयाबी लेखिका अंकिता जैन को किसी परिचय की मोहताज नहीं रहने देती। समकालीन मुद्दों पर भी इनकी लेखनी बखूबी चलती है और धारदार चलती है।


बहरहाल बात करते हैं #बहेलिए की। यह एक कहानी संकलन है जिसमे 7 कहानियां हैं। बहेलिए का मतलब है शिकारी जो बुलबुल को पिंजरे में कैद करने को आतुर है। अब ये कहानियां उन्ही शिकारियों को अलग अलग रूप में प्रस्तुत करती है और किताब की भूमिका लिखते हुए ये लेखिका ने पाठकों पर रख छोड़ा है कि कौन हैं ये बहेलिए।


किताब की शुरुआत जिस कविता से होती है वह पढ़कर के आप जरूर ठहरेंगे और सोचेंगे , और ठीक यही हर कहानी के बाद भी। एक कहानी खत्म करने के बाद आप तुरंत दूसरी पर नहीं जा सकते, बतौर पाठक मै तो आगे नही बढ़ सकी।


हर कहानी अपने आप मे एक उपन्यास समेटे है। जहाँ कहानियों में पात्र परिचय और किरदार की रचना उनका चरित्र चित्रण करना कठिन होता हैं क्योंकि कम शब्दों में ज्यादा कहना होता है , लेखिका ने कहानी दर कहानी इसे बखूबी निभाया है। छोटी से छोटी बात का बहुत बारीकी से खयाल रखा है।


हर कहानी अलग कालखंड, अलग जगह , अलग तरह की बात करती है लेकिन लेखिका का भाषा का चुनाव और भाव परिवर्तन इतना सहज है कि गांव से शहर, किसी जर्जर मकान से मुम्बई का फ्लैट , अनपढ़ से ग्रेजुएट , स्थानीय भाषा का उपयोग और जगहों का विवरण इतनी विविधता लिए हुए है कि पढ़कर आप भी वही होंगे और ये तो कतई महसूस नही होगा कि नही ऐसा थोड़े होता है, हर जगह , हर किरदार आपको कही न कही देखा और सुना लगेगा।


दो और खास बातें हैं इस संकलन की जो मुझे बेहद खूबसूरत लगी।पहली ये की हर कहानी समकालीन मुद्दों से और घटनाओं से बहुत ज्यादा बारीकी से जुड़ जाती है और दूसरी की भले ही कहानियां महिला प्रधान हो लेकिन लेखिका ने पुरुष किरदारों के मनाभावो को भी उतनी ही खूबसूरती से उकेरा है, खासकर "प्रायश्चित" में!


पहली कहानी "मज़हब" जो हिन्दू मुस्लिम दंगो के भयावह रूप को दिखाती हुई कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी खड़े करती है और ये भी दिखाती है कि किस तरह सिर्फ साल बदलते हैं स्थितियाँ नहीं। जुली ,इकराम की प्रेम कहानी आपको बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देगी।


दूसरी कहानी "एक पागल की मौत" शांति की कहानी है और चुनावी प्रपंचो के चलते वह किन परिस्थितियों से गुजरती है यह कहानी उसी की है। कहानी हँसते हँसाते और चुहलबाजी करते हुए उस मोड़ पर पहुँचती है जहां ठहरकर ये सोचना जरूरी हो जाता है असल मे पागल कौन है।


तीसरी कहानी "रैना बीती जाए" आकाश और मीरा की कहानी है। एकल माँ के संघर्ष और कुछ सवाल समेटे हुए। एक सशक्त औरत की कहानी।


चौथी कहानी "कशमकश" वाकई आपको कशमकश में लाकर खड़ा कर देती है। गांव देहात की खुशबू और हरिया , रानी और बिसना की कहानी।


पांचवी कहानी "कन्यादान" सुमन और उसके बाबा की। एक पिता की व्यथा और बेटी की कथा। ठेकेदार की चालाकी और सुमन के संघर्ष की कहानी।


छटी कहानी "प्रायश्चित" किशोरी ,सुन्नी उनकी बेटी लाली की दास्तां। पढ़िए और जानिए किसने किस बात का प्रायश्चित किया।


आख़री कहानी "बंद खिड़कियां" छवि की जिंदगी की बंद खिड़किया खुलती है या नही ये जानिए। ये कहानी जरूर आपकी जिंदगी की कुछ बंद खिड़कियों पर जरूर दस्तक देगी।


सभी कहानियां बहुत ही प्यारी है और ये क़िताब इंद्रधनुष की तरह जीवन के कई रंगों से रुबरु करवाएगी। हर कहानी को पढ़कर सोचेंगे कि क्या ये भी जीवन का रंग हो सकता है? आपको झंझोड़ते हुए कई सवालों के जवाब भी देगी और कुछ सवालों के बीच छोड़ जाएगी। ये कहानियां रोंगटे भी करती हैं और मुस्कान भी देती हैं और क़िरदारों को आपके सामने लाकर खड़ा कर देती हैं।


भाषा सौंदर्य, कहानी का विस्तार ,संवेदना हर चीज़ पर लेखिका की मजबूत पकड़ के मद्देनजर लेखिका से अनुरोध है कि जल्द ही उपन्यास लिखें।


ऐसे ही लिखती रहो सखी खूब स्नेह!


Do Like,Share, Comment and Subscribe my blog.It is the only motivation for me to work better.



Click to Buy

52 views0 comments