• Pooja Jain

घाट-84 -रिश्तों का पोस्टमार्टम


"चरागे मुहब्बत जलाकर रखे थे,

बुझाने को उसको तूफ़ा खड़े थे।


किसको दुहाई देते हम सौरभ ,

बचाने को जिसको अकेले लड़े थे ..."


ये पंक्तिया कहीं है "घाट-84 , रिश्तों का पोस्टमार्टम" की नायिका "निशा" ने नायक "सौरभ"से !!


जब ये पुस्तक उठाई थी तो सच कह रही हूँ मेरे मन में यही था बनारस और घाट लेखकों का प्रिय स्थान है और इसके बारे में इतना सुन लिया की क्या ही नया होगा ? दूसरा ये की अस्सी घाट और मणिकर्णिका घाट इन सबके बारे में तो सुना है ये घाट 84 क्या होगा इसके बारे में नहीं सुना उसपर रिश्तों के साथ लिखा "पोस्टमार्टम" एक अजीब सी बेचैनी बढ़ा रहा था क्यूंकि जैसा की पुस्तक की पुस्तक की भूमिका में भी लिखा है की ये एक नकारात्मक शब्द है।


खैर सौरभ जी (जी हाँ , पुस्तक के लेखक का नाम भी सौरभ है , ये पुस्तक कविता सिंह जी और सौरभ दीक्षित "मानस " जी की साँझा लिखित कृति है ) से बातचीत के बाद इतना स्पष्ट हो चूका था की ये उस बनारस की सैर तो कम से कम नहीं कराएगी जिसकी अब तक हम कर चुके हैं।


343 पृष्ठों की ये पुस्तक मैंने लगभग उसी तरह पढ़ी जिस तरह गंगा के किसी घाट पर बैठकर कुल्हड़ वाली चाय सुडक कर पी जाती है , और सच कहूं तो इसके बारे में लिखना भी उतना ही मुश्किल है , क्यूंकि


"खुसरो दरिया प्रेम का सो उल्टी वाकी धार!

जो उबरा सो डूब गया; जो डूबा वो पार!!"



निशा जिसका दबदबा ऐसा की जो कहे वो हो , दोस्त और पूरा बनारस जिसे पंडित कहता है ; सौरभ एक सीधा साधा कनपुरिया लड़का और माँ का "सुग्गा" ; दोनों की मुलाकात बनारस के घाट पर होती है और घाट 80 से घाट 84 तक का सफर दोनों के जीवन का एक अहम हिस्सा समेटते हुए और एक डायरी जो निशा के पंडित बनने की कहानी लिए हुए है जो गलती से सौरभ के हाथ लगती है और वो दबंग पंडित के अंदर छुपी मासूम निशा से मिलता है।


निशा और उसकी मण्डली आपको जहाँ बनारस के दर्शन कराते है वहीँ अपने दबदबे के चलते लोगों की परेशानियों का हल निकालते हैं।


सौरभ जैसे जैसे निशा के अतीत से वाकिफ होता है उसकी तरफ और आकर्षित होता जाता है , पर जैसा की होता आया है हर किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता और मुकम्मल प्यार तो विरलो की ही नसीब में होता है। अपनी अपनी परिस्तिथियों के चलते दोनों अलग होते हैं फिर मिलते हैं या नहीं और मिलते हैं तो उनके बीच की कड़ी क्या होगी ये महत्वपूर्ण सवाल है और उसके लिए आपको किताब उठा लेनी चाहिए।


कहानी बहुत सी परतों में है और हर परत किरदारों का नया रूप सामने लाती है। माँ, पिता ,भाई ,बहिन, दोस्त ,रिश्तेदार सबके रिश्तों और अंतर्मन की ये कहानी हर तरह से उनकी रेशा रेशा पड़ताल करती नजर आती है इसलिए कहा है "पोस्टमॉर्टम " .


लव जेहाद , स्कूल , बालिका गृह , ऑफिस में चलते पॉलिटिक्स और वहां की सच्चाई को उजागर करती ये किताब उसी तरह आपको आगे लेती जायेगी जैसे चाँद के आकार के साथ घटती बढ़ती गंगा मैया की लहरें।


कहानी में बहुत से बहुत से मोड़ हैं और एक मोड़ से दुसरे मोड़ तक का सफर बिना किसी स्पीड ब्रेकर तय करना वो भी इतने बड़े कथानक में सबसे जटिल कार्य है वो भी जब एक लिखने वाले "मार्स" और एक "वीनस" से हों।


जितनी सुगमता से कहानी के किरदार और घटनाक्रम डायरी के पन्नो पर छोड़े गए उतनी ही सुगमता से इनकी वापिस कहानी में दिखाई गयी है और इस वापसी में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है "यशी " और " कृतिका "....


अगर आप ये सोच रहे हैं की मैं आपको इनके बारे में बताउंगी तो बस इतना की "इशारों को अगर समझो राज़ को राज़ रहने दो"...


और पंडित और उसकी "पगलू" यानी सौरभिया , और उनकी पूरी मण्डली के साथ घूमिये बनारस , BHU , कानपूर, दिल्ली और लखनऊ।


गद्य और पद्य के बेजोड़ रंगो से सजी ये किताब लम्बी है पर उबाऊ नहीं। कहानी और किरदार बनारसी चाय के साथ चटपटी कचोरी सरीखे हैं। पढ़ते हुए ये यह कहीं नहीं लगा की कहानी का कोई हिस्सा या कोई किरदार गैर जरुरी है।


कुछ संवाद और कविताओं की बानगी देखिये ...


"आँखे भारी थी पर मन हल्का होकर आसमान में उड़ रहा था "


"जुगाड़ , भारत में सबसे अधिक बोले जाने शब्दों में से एक है। हमारे यहाँ तो शादी ,बारात ,पढाई ,नौकरी से लेकर सरकार बनाने तक जुगाड़ का बोलबाला है। सच में अगर जुगाड़ न हो तो देश की आधी आबादी तो भूखी मर जाए "


"रख दी कलम है पर छूटी नहीं है ,

किस्मत हमारी भी रूठी नहीं है ,

लिख देंगे फिर से इबारत नयी सी ,

कलम भी हमारी तो टूटी नहीं है "


कविता, कहानी, अलग अलग बोली और इलस्ट्रेशन से सजी ये पुस्तक आपको पसंद आएगी और किरदारों से मोहब्बत करने पर मजबूर करेगी।


पंडित ,यशी और सौरभ को आप जितना अल्हड पाएंगे उतनी ही सशक्त और समझदार। जिंदगी के थपेड़ो को झेलते हुए भी इन किरदारों का मनोबल कमाल का है और ख़ास बात ये है सभी का ,और सभी आपको कोई न कोई प्रेरणा जरूर देंगे और किसी न किसी रूप में आसपास नजर आ जाएंगे। सौरभ से "मानस " और निशा से "पंडित " तक के सफर में भाषा शैली , रोचकता चरित्र चित्रण सब बेजोड़। कहीं आप ठहाके लगाकर हसेंगे और कहीं पलके भी भिगोयेंगे ; कभी किसी किरदार की समझदारी पर कायल होने को मन करेगा तो कभी किसी के भोलेपन पर अनायास ही "हट पागल " कह उठेंगे, जैसे मैंने निशा की नमक की कॉफ़ी के लिए कहा था।

कुछ अलग पढ़ना चाहते हैं और लम्बे समय तक एक किताब में खोने का मन है तो लगाइये गोते गंगा मैया के "घाट 84 " में। जिंदगी की सच्चाईओं को दिखाने की , मानस अंतर्मन को चित्रित करने की (मुझे आत्मसंवाद बहुत पसंद आये ) और समाज में फैले कलुष का पोस्टमार्टम करने की खूबसरत कोशिश।


दोनों लेखकों को हार्दिक बधाई और शुभकामनयें। यूँही रचते रहिये।।।




#bookflixing

#Twitter #Insta

#Facebook

Like, Comment & Share your views ... बिकॉज़ शेयरिंग इस केयरिंग!


72 views0 comments