• Pooja Jain

Lhasa Nahin... Lavasa

"Traveling: It leaves you speechless, then turns you into a storyteller."

ल्हासा नहीं ... लवासा पुस्तक में नवीन जी द्वारा लिखित ये शब्द एक यात्राकार की कहानी को समेटते से नजर आते हैं। और प्रस्तावना में लिखी एक और बात जो उन्होंने फिल्म "जिंदगी ना मिलेगी दोबारा" के बारे में लिखी है , वो भी अक्षरश सत्य है , यहाँ तक की उस फिल्म के बाद स्पेन का टूरिज्म भी बढ़ा था।

सिर्फ ZNMD ही क्यों आमिर खान की "दिल चाहता है " हो या "Queen " सब की सब अपना बैकपैक उठाने को लालायित कर देती हैं।


इस क्रम में अगर पुस्तकों की बात करें तो कृषणनाथ जी की छोटी छोटी डायरी समान पुस्तकें हों या प्रसिद्ध कथाकार राहुल सांकृतायन जी की किताबें या हाल ही में आयी अजय सोडानी जी ,नीरज मुसाफिर जी या उमेश पंत जी की किताबें हों , सब की सब आपको घर बैठे ही सैर कराती हैं और अलग अलग जगहों के बारे में वहां के मौसम , खान पान और संस्कृति से आपका परिचय कराती है।


इस क्रम में नयी किताब है सचिन देव शर्मा जी की पुस्तक ल्हासा नहीं ... लवासा। सचिन देव शर्मा पेशे से एचआर प्रोफेशनल हैं और शौक से एक लेखक व यात्री। सचिन बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी, दिल्ली से एमबीए हैं और गुरुग्राम में एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत हैं। यात्रा, एचआर व अन्य विषयों से संबंधित उनके आलेख उत्तरांचल पत्रिका, जानकी पुल, आई चौक व दैनिक जागरण आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सचिन अपने ट्रेवल ब्लॉग यात्रावृतडॉटकॉम पर लगातार अपने यात्रा अनुभव साझा करते रहते हैं तथा अन्य लोगों को भी इस ब्लॉग पर अपने यात्रा अनुभव साझा करने के लिए प्रेरित करते हैं।लॉक डाउन में कहीं जा नहीं सकते थे इसलिए यात्रा संस्मरण से पढ़ने से बच रही थी क्यूंकि यात्रा करना जरा मुश्किल था। फिर इसको दुसरे नजरिये से देखा तो सोचा की शरीर को ना सही मन को ही सैर करा दी जाए। सचिन जी एक ट्रेवल ब्लॉगर हैं


आमतौर पर जब यात्रा संस्मरण की बात होती है तो वो या तो अकेले यायावरों या समूह में यात्रा करने वालो द्वारा ही लिखी गयी हैं कम से कम मेरी अल्पबुद्धि में जो नाम अब तक हैं ; और इसी से अलग सचिन जी की पुस्तक सम्पूर्ण परिवार और दोस्तों के साथ यात्रा के रंग समेटे है और यहीं ये पुस्तक अपने आपको अलग करती है , क्यूंकि एक सामान्य भारतीय परिवार एक साथ घूमने निकलता है वो भी या तो कार्यालय का साप्ताहिक अवकाश हो या दो या से तीन छुट्टिया एक साथ आ रही हों, और इस बारे में लेखक ने क्या लिखा है देखिये .....


"मंगलवार , 2 अक्टूबर 2018, दफ्तर की छुट्टी थी। एक अक्टूबर की छुट्टी ले ली तो शनिवार , इतवार की छुट्टी मिलाकर चार दिन की छुट्टी बन गयी। "

एक आम नजारा जो कोई भी छुट्टी प्लान करते हुए होता है , चाहे आप हों या मैं। नौकरी वाले लोगो के बिलकुल आम , बिज़नेस फॅमिली में ऐसे मौके कम ही आते हैं इसीलिए मेरी घुमक्कड़ी ज्यादातर या तो स्कूल के दोस्तों के साथ हुई या ऑफिस के, और खुशनसीबी से दो यात्राएं अकेले भी की। हर यात्रा अलग अनुभव देती है , जहाँ परिवार सहित यात्राएं ज्यादा प्लानिंग मांगती है क्यूंकि परिवार की सहूलियत अहम हो जाती हैं वही अकेली या दोस्तों संग की जाने वाली यात्राएं थोड़ी बेफिक्री लिए होती हैं। लेखक महोदय इस फर्क को दिखाने में कामयाब हुए हैं। हर यात्रा से पहले किया जाने वाला होमवर्क इसकी गवाही देता है।


कैब बुकिंग हो या बच्चो के लिए एडवेंचर ढूंढ़ना , या फिर दो जगहों के बीच आने वाले छोटे छोटे गाँव और उनके बीच की दूरिया सबका विवरण बखूबी मिलेगा। लेखक ने ये बखूबी दिखाया है की मंज़िल से ज्यादा रास्ते अहम होते हैं। गुमटियों पर चाय की चुस्कियां और फोटोग्राफी और रास्ते के लिए चिप्स और बिस्कुट लेना आपको कहीं भी ये महसूस नहीं होने देंगे की आप पुस्तक पढ़ रहें है बल्कि लगेगा आप खुद यात्रा में है , या कई जगह लगेगा अरे हम भी तो यही करते हैं जैसे " निगाहें किसी ऐसे रेस्टॉरेंट की तलाश में थी जो हमारे जैसे लोगों की जेब और जीभ दोनों को सूट कर सके "


दोस्तों के साथ दिल खोलकर गपशप हो ,होटल लॉबी से फोटोग्राफी हो , बालकनी में बैठकर प्रकृति का आनंद लेना हो या फिर परिवार के साथ सुकून के पल सब कुछ समाते हुए और हर जगह का भूगोल और इतिहास बताते हुए ये संस्मरण आपको जमटा में न सही घर में ही सुकून के पलों के साथ "Travel Goals " भी देगा।

यात्रा हो और कैमरा अपनी भूमिका न निभाए ऐसा तो नहीं हो सकता , चाहे बटरफ्लाई चैलेंज हो या मंदिर के बाहर समूह चित्र लेखक ने यात्रा को दिल के साथ कैमरा में भी क़ैद करने में कोई कोताही नहीं बरती ( इसका अंश आप मेरे पेज bookflixing पर देख सकते हैं )


बेशक यात्रा संस्मरण है पर शब्दों की जादूगरी भी बखूबी मिलती है इस यात्रा में .....


"ठीक ही है यार,कोई तो है जो अपने मन की कर पा रहा है। वरना तो जिंदगी सामने घाटी में दिखने वाले उन बिजली के बल्ब की तरह हो गयी है जो रात को जलती है और सुबह होते ही बुझ जाती है "


कूल मिलाकर बहुत ही सरल संवाद , आम बातचीत और यात्रा की शुरू से अंत तक के खुशनुमा पल और छोटे बड़े किस्से समेटे जमटा , लवासा , लाल टिब्बा , कोटद्वार और जयपुर की यात्रा कराते हुए आपके चेहरे पर मुस्कराहट के साथ घूमने की ललक भी ले आता है।


अब किस्से की शुरुआत प्रस्तावना से हुई थी तो समापन भी वहीँ से करना नैतिक जिमेदारी सरीखी लग रही है इसलिए... "हर यात्रा हमेशा सुंदर नहीं होती , हर यात्रा हमेशा सुखदायी नहीं होती, हमेशा आरामदायक नहीं होती , लेकिन हर यात्रा आपको बदलती है। हर यात्रा हमारे दिल, दिमाग ,अवचेतन मन और जीवन पर कुछ असर छोड़ जाती है "


क्यूंकि पात्र और जगह कुछ भी काल्पनिक नहीं है इसलिए यहाँ उनके बारे में बात करने का कोई औचित्य नहीं , उसके लिए पुःतक को थाम लीजिये , और सिर्फ लेखक से ही नहीं उसके परिवार और दोस्तों से भी मिलिए। एक यायावर की डायरी सरीखी ये पुस्तक जरूर पढ़िए और घूमते रहिये , याद बनाते रहिये , तस्वीरें लेते रहियें और हाँ टूरिज्म को बढ़ावा दीजिये ,चाहे कुछ शब्दों में ही सही अपनी यायावरी के किस्से जरूर लिखें।


अगली यात्रा तक राम राम !!!!






59 views1 comment

Recent Posts

See All