• Pooja Jain

माँ की डायरी

पुस्तकें सही मायने में हमारी वह दौलत हैं,जो हम आगे की पीढियों के लिए छोड़कर जाते हैं।एक लेखक को समझने की वे ही सबसे अच्छे हथियार होते हैं। हमारी सभ्यता और संस्कृति के भी वे ही पक्के दस्तावेज होते हैं।
किताबों के द्वारा न केवल हमारी कल्पना शक्ति का विस्तार होता है, बल्कि भाषा मे सुधार करके वे हमें सभ्य और संस्कृत बनाने का काम भी करती हैं।

ये कथन है मौमिता जी की पुस्तक "माँ की डायरी" से।

ये डायरी है सुधामयी जी की, या ये कहूँ की हर उस औरत की जिसको कभी जीवन में "सुधा" नही मिली। मिला तो सिर्फ संघर्ष, पढ़ी लिखी होने के बावजूद , काबिल होने के बावजूद और पुरुष से दो दर्जे आगे होने के बावजूद।

माँ पर इतना कुछ लिखा जा चुका है कि अगर मैं ये कहूँ की इस कहानी में आपको एक अलग माँ देखने को मिलेगी तो ये गलत होगा। माँ या यूं कि औरत वही रहती है बस संघर्ष और परिस्थितियों में बदलाव होता है।

बात करते हैं सुधामयी की जिनको बचपन मे ही पिता के दोस्त ने अपने पुत्र के लिए पसंद कर लिया था, शादी भी हुई। वचन पालन वाली इस शादी को ना सुधा की सास ने ना पति ने कभी दिल से स्वीकार किया, ज्यादातर उसके औसत रंग रूप के कारण। उसके रूप के आगे उसके गुण हमेशा गौण ही रखे गए।

रिश्ते निभाते हुए, परिस्थितियों से लड़ते हुए सुधा का जीवन गुजर रहा था। शिकायत कभी नही की, और करती भी किस से और क्या कहती। पीढियों से नारी को समझौतों के लिए ही तो तैयार किया जाता है।

एक खुशी का झोंका पुत्ररत्न के रूप में सुधा के जीवन में आया और कहानी की शुरआत भी माँ की मौत के बाद एक दराज में मिली डायरी से ही होती है। वक़्त बेवक्त लिखी बेचैनियां और वो बातें जो सुधा किसी से नही करती थी वो नीली डायरी के इन पन्नों में दर्ज थी।

परत दर परत ये डायरी बेटे बलवीर के सामने माँ के उस पहलू को लाकर खड़ा करती हैं जिनसे वो बिल्कुल अनजान था। चाहे वो ससुर की मौत के बाद उनके मृतप्राय व्यवसाय में जान फुकना हो या रिश्तों की कच्ची डोर को हर परिस्थिति में थामे रखना हो, या नकारा पति के और सास के आये दिन के ताने उलाहनों को झेलना हो।

बलवीर शनै शनै अपनी माँ के संघर्षों से रूबरू होता है, लेकिन इसी बीच उसके सामने एक सच ऐसा आता है जो उसकी पहचान पर काबिज हो जाता है। क्या है वो सच इसको तो आप पुस्तक पढ़ने के बाद ही जान सकेंगे।

सभी किरदारों के चरित्र चित्रण इस कदर किया गया है कि किरदार जीवंत हों उठता है। उनके पहनने, बोलने ,चलने जैसी बातों पर भी खास ध्यान दिया गया है। इस किताब की सबसे मुकम्मल बात ये है कि मौमिता जी ने हिंदी भाषा का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। अंग्रेजी या दूसरी भाषा के शब्द लगभग नगण्य है, जो इनके हिंदी प्रेम और उसपर इनकीं पकड़ को पुख्ता करता है। और हो भी क्यों ना आखिर राजभाषा में सरकारी कार्यभार संभाला है।

झारसुगड़ा वाले किस्से में इन्होंने बाकायदा उस जगह का वर्णन गूगल साभार किया है और एक शब्द jetlag का मतलब तक शामिल किया है।

आमतौर पर लेखक यही सोचता है कि इसका मतलब क्या बताना या झारसुगड़ा जैसी जगह के बारे में क्या बताना। कईं बार चीज़े पता होते हुए भी पढ़ते हुए दिमाग मे नही आती और ऐसा प्रयास लेखिका को एक दर्जा आगे खड़ा करता है क्योंकि इसमें पाठक की सहजता के ध्यान रखा गया है। कहीं कहीं लिखी कवितामयी पंक्तिया पढ़ने का मजा बढ़ा देती हैं।

बाकी बंगाल के पानी में लेखन है ही, पहला नावेल बंगाल की धरती से ही निकला था लेखिका के प्रयास को देखकर स्पष्ट है कि ये लेखनी जादू जरूर बिखेरेगी।

अगर प्रयास है तो त्रुटियां भी होंगी, प्रूफरीडिंग बेहतर हो सकती थी।

ढेरों शुभकामनाएं मौमिता जी इस सुंदर प्रयास के लिए, माँ सरस्वती आपकी लेखनी को धार देती रहें।

इति शुभम!!


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