• Pooja Jain

मोहनदास

Updated: Jul 17, 2020

जिसे बनना हो बन जाए मोहनदास। मैं नहीं हूं मोहनदास। मैंने कभी कहीं से BA नही किया। कभी टॉप नहीं किया। मैं कभी किसी नौकरी के लायक नही ।बस मुझे चैन से जिंदा रहने दिया जाए। अब हिंसा मत करो। जो भी लूटना हो लूटो।अपने घर भरो। लेकिन हमें तो अपनी मेहनत पर जीने दो!

आज बापू शायद यही कह रहे होंगे.. ये गुहार भी मोहनदास की ही है.. आइये जानते है कौन है ये...


हम सब मोहनदास करमचंद गांधी से तो वाकिफ़ हैं.. कम से कम जो हमारी जेब में अठखेलियां करता है उससे तो हैं ही। आज आपको एक और मोहनदास से मिलवाते हैं...


ये हैं #उदय_प्रकाश जी के "मोहनदास"। जी हाँ लेखक महोदय ने बड़ी ही साफगोई से किरदारों और घटनाओं को महात्मा गांधी जी के इर्द गिर्द बुन दिया है और पाठकों पर सवाल भी उछाल दिया कि क्या ये आपको असली मोहनदास की याद दिलाता है!


उदय जी के रचित इस मोहनदास को सर्वप्रथम जगह मिली हंस में... लेकिन उस पर प्राप्त प्रतिक्रियाओं ने रूप दिया इसको अलग कृति का और इस मोहनदास ने भी खूब स्नेह बटोरा, इनाम लिए और बहुत से मंचन और बहुत सी भाषाओं में अनुदित हुआ।


जगह जगह दी गयी इलस्ट्रेशन और विवरण इसको अत्यंत पठनीय बनाते हैं और आप मुट्ठी बंद करके , आंखों के कोने भिगोये , लोकगीतों को सुनते हुए मोहनदास की दुनिया मे खो जाते हैं। सामाजिक कुरीतियों को भेदते हुए कब ये उपन्यास आपका दिल भेद जाता है और क़िरदारों के भाव आपके भाव बन जाते हैं पता ही नही चलता।

ये कहानी है छोटे से गांव बिछिया के मोहनदास की जिसने BA किया है और कॉलेज का टॉपर रहा। परिवार में माँ(पुतली बाई), पिता(काबा) ,बीवी(कस्तूरी),एक बेटी(शारदा) और एक बेटा(देव दास).. पर कबीरपंथी होने के कारण और घुस न खिला पाने के कारण एक अदद नौकरी नही है।


जहां जो कुछ भी काम मिलता है करता है और बीवी के साथ मिलकर गुजरबसर करता है और बीमार पिता और अंधी माँ की सेवा टहल करते हुए दिन बिताता है। अपनी उम्र से दोगुना दिखता है और खेती करते हुए अपने दिन फिरने का इंतज़ार करता है।


जिस दिन देव दास पैदा होता है उसी दिन कोयला खदान में नौकरी के लिए इंटरव्यू देकर अपने कागज़ जमा कराता है। इस नौकरी का पता उसको रोज़गार कार्यालय के द्वारा चलता है। सब कुछ ठीक हुआ और एक उत्साह के साथ वह घर लौटा और जोइनिंग का इंतज़ार करने लगा!


क्या हुआ आगे , मोहनदास को नौकरी मिली या नही , उसके असली दस्तावेज उसको मिले या नही ? क्या हो अगर आपसे कोई आपकी पहचान ही छीन ले ? आप दुनिया मे है भी या नही इस पर ही सवाल खड़ा करदे ?


पढ़िये और जानिए !


इस मोहनदास से मिलने के बाद एक टीस उठी और खत्म करके जो ख्याल दिमाग में आया वो ये की चाहे पहला गिरमिटिया बैरिस्टर "मोहनदस करमचंद गांधी" हो या पहला BA पास "मोहनदास" , दोनों को अपनी पहचान बनाने के लिए दुनिया से लड़ना पड़ा और जान से खेलना पड़ा, जिसपर ऊपर लिखी गुहार मोहर लगा देती हैं...


उपन्यास लगभग 15 साल पहले लिखा गया , बापू की 150वी जन्मजयंती थी इस साल लेकिन इस कालखंड में सिर्फ केलिन्डर बदले है बाकी कुछ नही।


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