• Pooja Jain

पुरुष



क्या आप बता सकते हैं कि पितृसत्तात्मक समाज और पुरुष प्रधान समाज के बीच क्या फर्क है?


क्या आप बता सकते हैं कि भगवान ने स्त्रियों और पुरुषों के लिए क्या नियम बनाये हैं?


हर आदमी के भीतर दैवीय और राक्षशी दोनों प्रवर्तियाँ होती है तो क्या कहने पर उसकी राक्षशी प्रवर्ति उस पर हावी होती है ?


इन दिनों महाभारत भी देख रही हूँ तो अभी 2 दिन पूर्व ही द्रौपदी के चीरहरण वाला दृश्य आया और ये दृश्य वाकई आपको अंदर तक हिला देता है और सत्ता का मद किस हद तक दिल और दिमाग पर हावी हो जाता है ये दिखाता है , बड़े बड़े ज्ञानी, ऋषि ,महाराज सबका मौन रहना व्यथित करता है और बड़े सवाल खड़े करता है, शायद अगर उस समय कुरु सभा मौन न रहती तो जो प्रथा उस समय से आज तक चली आ रही है, मौन रहने की और स्त्री को दोषी ठहराने की वो भी जीवित न रहती... ...खैर ये मेरा विचार है!


कल मैंने आदरणीय Ashutosh Rana जी की फ़िल्म #पुरुष या यूं कहूँ की नाटक देखा तो ये दृश्य मानसपटल परफिर से सजीव हो उठा। वही सत्ता का मद, पद का गलत इस्तेमाल, ऐसा नेता जिसके सामने कोई आवाज़ नही उठाता और जिसका शोषण करता है उसके प्रेमी तक को अपनी तरफ कर लेता है और दूसरी लड़की को मोटी रकम देकर उसको चुप करा देता है नाम है "गुलाब सिंह".


उसके लिए स्त्रियों के लिए निर्धारित नियम हैं और अगर कोई उस दायरे के बाहर है या कोई उससे उलझे तो उसके अंदर का राक्षस जिंदा हो जाता है। आशुतोष जी ने एक बार फिर एक्टिंग और एक्सप्रेशन में कमाल किया है। उनकी कुटिल हंसी, स्त्रियों का मान नही करना लेकिन दफ्तर में माता की तस्वीर से झांकता उनके चरित्र का दोगलापन जिसको उन्होंने पूरी फिल्म में ओढ़कर रखा है।


जब मेज पर हाथ मारकर अम्बिका को बैठने को कहते है तो दिल धक रह जाता है, जब जब गुलाब सिंह आता है धड़कने बढ़ जाती है और देखते हुए एक अजीब सा भय लगने लगता है! और फ़िल्म का अंत ऐसा है कि आप नही सोच सकते। आपको सोचना ही पड़ेगा कि गुलाबसिंह व्यक्ति है या विचारधारा?


ये थिएटर में चल रहा नाटक है तो कैमरा और फोकस लाइट्स का प्रयोग जबरदस्त है ही। अगर 2 घंटे से कम में कोई मास्टरपीस बिना किसी ताम झाम के देखना चाहते हैं और सिर्फ एक्टिंग और डायलाग का मजा लेना चाहते हैं तो जरूर देखिये। बैकग्राउंड स्कोर भी बढ़िया है।


Gulki Joshi मैडम सर ने कमाल का काम किया है, और बाकी क़िरदारों ने भी बहुत ही सधी हुई एक्टिंग की है। खासकर पारोमिता चटर्जी ने।


नारी कल भी भारी थी, नारी आज भी भारी है.. पुरुष कल भी आभारी था, पुरुष आज भी आभारी है...

आशुतोष सर के लिए बस इतना ही कहूंगी की ..


"You are the man I love to hate"💐💐💐


P.S. एक सीन की फ़ोटो डाल रही हूं जिसमे कलेजा मुँह को आ गया था।





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