• Pooja Jain

रामसिंह चार्ली

I had no idea of the character. But the moment I was dressed, the clothes and the make-up made me feel the person he was. I began to know him, and by the time I walked onto the stage he was fully born.

---चार्ली चैपलिन


कुछ ऐसी ही कहानी है रामसिंह चार्ली की, रामसिंह जो एक सर्कस में चार्ली का किरदार निभाता है इसलिए उसका नाम ही रामसिंह चार्ली पड़ जाता है। जैसा की हम सब जानते हैं की आजकल सर्कस देखने जाता कौन है तो ये सर्कस भी घाटे में होने के कारण बंद करना पड़ता है।


और इसके बाद जैसा की रामसिंह चार्ली की मालकिन कहती है की " इधर तो कुछ भी गुलाटीयां नहीं मारा , असली सर्कस तो उधर है बाहर "


कितना सच है ना ये , बाहरी दुनिया किसी सर्कस से कम नहीं है , यहाँ रोज़ जोकर की तरह मुखौटा पहना जाता है , बड़े छोटो को रिंगमास्टर की तरह अपनी सोच से काबू करना चाहते हैं और छोटे किसी जादूगर की तरह उनको रोज़ नए करतब दिखाकर हैरान करते हैं।


खैर ,सर्कस बंद होने के बाद शुरू होता है असली सर्कस। आये दिन नयी तकनीक और ऑनलाइन गेम्स की दुनिया में कोई भी सर्कस देखने को तैयार नहीं इसलिए नौकरी कहाँ से होंगी ?


नयी तकनीक और नए आविष्कार जहाँ सुख सुविधाओं को बढ़ावा देते हैं वहीँ किसी किसी क्षेत्र में बेरोजगारी उत्पन्न करते हैं , इसका बेहतर उदाहरण है ये फिल्म। लेकिन अगर क्षमता हो तो इस समस्या का निदान हो सकता है , यहाँ एक बात और है की चाहे कोरोना के कारण हो या उच्च तकनीक के कारण बेरोज़गारी अपने देश की एक बड़ी समस्या है , और रामसिंह चार्ली में ना सिर्फ समस्या को दिखाया बल्कि अपनी सोच को सकारात्मक रखते हुए और किसी भी काम को छोटा या बड़ा ना समझकर कैसे उससे निपटा जा सकता है ये भी बखूबी दिखाया गया है।


एक्टिंग की बात करें तो कुमुद मिश्रा जी की अभिनय की क्या कहें चार्ली के किरदार को और रामसिंह के संघर्ष को उन्होंने जीवंत किया है। चाहे पति का प्रेम दिखाना हो या सर्कस में काम करते हुए , बल्कि ना करते हुए भी अपने मालिक के प्रति वफादार रहना,बच्चो को अच्छी परवरिश देना हो या दोस्तों को उनका खोया आत्मसम्मान वापिस दिलाना रामसिंह एक आदर्श किरदार है , और चार्ली के किरदार में तो शब्दहीन कर देते हैं।


दिव्या दत्ता ने कजरी के रूप में एक ऐसी पत्नी का किरदार निभाया है जो किसी भी परिस्थिति में पति का साथ नहीं छोड़ती और जब भी वो निराश होता है उसको वापिस खड़े होने का हौसला देती है।


आकर्ष खुराना जी नबील के किरदार में हैं जो मास्टरजी (सलीमा रजा ,सर्कस की मालकिन) के बेटे हैं और इस सर्कस को बंद कराने का मुख्य कारण भी। अपनी माँ के ना चाहते हुए भी वो ये सर्कस बंद करता है ,क्यूंकि सर्कस मास्टरजी की जिंदगी है और जैसे शरीर से आत्मा निकल जाती है तो कुछ नहीं बचता ,कुछ ऐसा ही होता है है मास्टरजी और रामसिंह के साथ।


रामसिंह के बेटे चिंटू का किरदार निभाया है हेमवंत तिवारी ने जिनके स्टेज परफॉरमेंस से शुरू होकर फिल्म उनके स्पीच से ख़तम होती है जिसमे बेटे का पिता और उनके संघर्ष का सम्मान दिखाया गया है, बहुत ही भावविभोर करने वाली है।


कोलकाता की लोकेशंस को बखूबी फिल्माया गया है और हर किरदार कहानी को आगे ले जाता है। कुछ सीन्स गहरी छाप छोड़ते हैं जैसे की रामसिंह जब बेटे के स्कूल में फादर्स डे पर स्टेज संभालता है तो परफॉरमेंस के बाद बजती तालियां उसको एहसास कराती हैं की वो इसी के लिए बना है तब वो सर्कस को अपने दम पर वापिस खड़ा करने के उद्देश्य से बहार निकलता है, बहुत भाव विभोर करता है।


आपका पता नहीं पर मुझे शाहरुख़ खान के सीरियल सर्कस की बहुत याद आयी इसको देखते हुए। फिल्म बहुत जगह हँसाने के साथ आँखे नम करने वाली है। अगर आप मसाला फिल्मो और गाली गलौज से हटकर एक सुकून भरी फिल्म देखना चाहते हैं तो जरूर देखिये। ये फिल्म बहुत सधे हुए तरीके से दिखा देती है की एक से ज्यादा कला में पारंगत होना कितना आवश्यक है इस हर दिन बदलती दुनिया में, और दूसरा क्योंकि बदलती तकनीक काम करने के तरीकों में बदलाव ज्यादा लाती है बनिबस्त बेरोजगारी के (क्या कोरोना से पहले आपने कभी सोचा था वर्क फ्रॉम होम और स्कूल फ्रॉम होम के बारे में ), इस फिल्म में भी दिखाया है सर्कस न सही रामसिंह बच्चो की पार्टीज और माल में काम करता है। चाह अगर हो तो राह मील जाती है।


मैं ना तो ये कहूँगी की इससे बेहतर फिल्मे नहीं बनी , ना ये कहूँगी की इस फिल्म की कहानी नयी है, लेकिन सीधे साधे मनोरंजन और बचपन में लौटने क लिए ये जरूर देखी जा सकती है। पहला भाग काफी सुंदर बन पड़ा है दूसरा थोड़ा धीमा जरूर है पर बोर नहीं होने देता। एक और बात बच्चों को ध्यान में रखकर या ऐसी फ़िल्में जो बच्चो क साथ देखी जा सके बहुत कम बनती हैं , ये फिल्म एक बेहतरीन विकल्प है उनके साथ समय गुजारने का भी और सर्कस जैसी विलुप्त होती कला से उनका परिचय कराने का भी।


निर्देशक नितिन कक्कर की अब तक की सबसे बढ़िया फिल्म लगी, हालाँकि मित्रों और फिल्मिस्तान भी ठीक हैं पर ये मुझे ज्यादा बेहतर लगी। संगीत कर्णप्रिय है और बोल बढ़िया।


तो देखिये रामसिंह में बसे चार्ली को !!!


That which is apparent ends. That which is subtle is never-ending.

---चार्ली चैपलिन





"ये तो बहुत छोटा सर्कस था, बाहर इससे बड़ा सर्कस है.."



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