• Pooja Jain

Shakuntala Devi (शकुंतला देवी)

Updated: Aug 29, 2020


माँ.... मोस्टली हम सबका पहला शब्द। एक ऐसा शब्द जिसको डिफाइन करने जाओ तो बाकी सारे शब्द फीके पड़ जाते हैं। माँ को भगवान् का नहीं भगवान् को माँ का दर्ज़ा दिया गया है। सैक्रिफाइस का दूसरा नाम है माँ, पर मेरी माँ ऐसी नहीं है।

ये शब्द है शकुंतला देवी की बेटी अनुपमा के(शब्द भले ही अनुपमा के हो पर ये सोच भारतीय समाज की है, इसको नकारा नहीं जा सकता).


शकुंतला देवी "The Human Calculator " जिन्होंने गणित को अपनी उंगलियों पर नचाया जो सिर्फ गणितज्ञ नहीं भविष्यवक्ता भी थी, जिन्होंने होमोसेक्सुअलिटी जैसे विषय पर किताब लिखी और इंदिरा गाँधी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा, जो कंप्यूटर से तेज गणना करती थी और उसके राउंड ऑफ एरर तक को पकड़ लेती थी।


एक बेहद साधारण तमिल ब्राह्मण परिवार की बेटी का अर्श से फर्श तक का सफर आसान तो बिल्कुल नहीं रहा होगा कम से कम इतना तो बिल्कुल नहीं की दो घंटे की फिल्म देखकर यह कयास लगाए कि वह कैसी मां थी या कैसी औरत थी।


चलिए बात करते हैं फिल्म की, सक्कु (शकुंतला देवी )जिसके पिता उसकी प्रतिभा जानने के बाद उससे मैथ शोज करवाते हैं , जिसकी मां उसके पिता के सामने कुछ नहीं कह पाती चाहे वह बेटी के कमाए हुए पैसों का इस्तेमाल कैसे भी करें यहां तक कि अपनी बड़ी बेटी का इलाज तक भी ना करवाए। यही कारण बनता है सक्कु और उसकी मां के बीच दरार आने का।


बालसुलभ खेलों को चाह कर भी ना खेलने वाली सक्कु जब मां से कहती है कि "वह मेरे अप्पा नहीं है मैं उनकी अप्पा हूँ , दूसरे घरों में अप्पा कौन होते हैं जो काम करते हैं जो पैसे कमाते हैं घर चलाते हैं तो हमारे घर के अप्पा कौन", तो उसकी मां कहती है कि देखना तेरी बेटी भी तुझे यूं ही सताएगी।


जब बहन उससे कहती है कि "तू किसी से नहीं डरती देखना तू एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगी, तो सक्कु कहती है कि बड़ा आदमी क्यों बनूँगी बड़ी औरत क्यों नहीं फिर बहन बोलती है कि बड़ा आदमी थोड़ी कुछ होता है। सक्कु कहती है फिर तो मैं बड़ी औरत ही बनूंगी, तू मेरे हमेशा मेरे साथ रहेगी "विद्या कसम", और वो बनी। जाने कितने देश घूमी, कितने बड़े बड़े नेताओं,अभिनेताओं, Bureaucrats से मिली और उनको अपनी प्रतिभा का मुरीद बनाया।


बचपन से ही तेजतर्रार सक्कु समाज के किसी ख़ाँके में फिट नहीं होती। वह ना तो किसी नियम को मानती है और ना मर्द औरत के भेदभाव को वह जो करती है, अपने मन से करती है।वह अपना हिस्सा छोड़ने को तैयार नहीं है उसे सब कुछ चाहिए वो भी अपनी शर्तो पर।


शकुंतला देवी एक ऐसी मैथ जीनियस है जिसको बचपन में स्कूल नहीं मिला ,माँ बाप का प्यार नहीं मिला। और बड़ी होने पर भी प्यार बार बार उनकी जिंदगी से माइनस हुआ। लेकिन फिर भी अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के बल पर विश्व रिकॉर्ड बनाये और कितने ही देशो में भारत का और अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।


भारतीय समाज में स्त्री को सिर्फ एक अच्छी बेटी,एक अच्छी बहु ,एक अच्छी पत्नी आदि रिश्तों में बंधा हुआ देखना ही स्वीकार्य है. एक आजाद ख्याल गणितज्ञ उनकी सोच के दायरों से बाहर है।उसका प्रेमी कहता है " तुम कुछ ज्यादा ही इंडिपेंडेंट हो " और बेटी के लिए वो नार्मल Mom नहीं हैं। एक ऐसी औरत जिसने अपने जीवन में रिश्तो कि संख्या को गणित की संख्याओं से पूरा किया, और साड़ी और Humur को कभी नहीं छोड़ा।


फिल्म में कोई भी बेटी अपनी माँ की तरह नहीं बनना चाहती, लेकिन जब वो खुद माँ बनती है तो सूत्र (formula) बदल जाते हैं और हर फिल्म की तरह यहाँ भी हैप्पी एंडिंग होती है।



फिल्म के पहले हाफ के डायलॉग् कमाल के हैं. विद्या ने एक्टिंग बढ़िया की है और एस्थेटिक्स और बॉडी लैंग्वेज पर अच्छा काम किया है। शकुंतला जी के डांस के शौक को खूबसूरत तरीके से दिखाया है। अब क्यूंकि वो "अमेजिंग है नार्मल नहीं " तो थोड़ी लाउड लगेगी। अमित साध ने Breathe 2 के साथ यहाँ भी जलवा बिखेरा है। सान्या एक इंडिपेंडेंट बेटी और फ़्रस्ट्रेटेड बेटी दोनों रूप में खूबसूरत दिखी। जीशु सेनगुप्ता को जितना स्क्रीन स्पेस मिला उसके अनुसार एक्टिंग ठीक है।


एक और किरदार जिसका जिक्र यहाँ होना चाहिए वो है ताराबाई जिसको शीबा चड्ढा ने निभाया है। कम scene मगर असरदार संवाद अदायगी की है और अपनी छाप छोड़ी है। छोटी शकुंतला के किरदार में अरेना नन्द और छोटी अनु के किरदार में चाहत तेवानी ने कमाल किया है। कुछ सीन्स बहुत प्यारे लगे जैसे सक्कु की ताराबाई के घर में एंट्री, J-Silent के साथ हर Scene बहुत भाया, दोंनो ने कमाल के "समीकरण" बनाये हैं।


गानों का लिरिक्स बहुत बढ़िया लगा। बैकग्राउंड स्कोर और लोकेशंस पर अच्छा काम किया गया है।


कुछ संवाद जो बेहद खूबसूरत लगे वो ये रहे


" हम इंसान हैं पेड़ नहीं, हमारे पास पाँव हैं जड़ें नहीं , पता है क्यों , ताकि हम दुनिया घूम सकें। "


"Why do men always want women to need them. "


" बच्चों को थोड़ा कम प्यार करो तो भी बच्चे बिगड़ जाते हैं, थोड़ा ज्यादा करो तो भी बच्चे बिगड़ जाते हैं, कोई भी माँ परफेक्ट नहीं होती।"


कूल मिलाकर फिल्म मुझे अच्छी लगी। एक आतमनिर्भर,आत्मविश्वास और खुद को अहमियत देती औरत और एक Over Possessive Mom की कहानी देखी जा सकती है। नवाज़ुद्दीन भाई अगर बायोपिक किंग है तो विद्या बायोपिक Queen ! विद्या कसम...


मैं इसके प्रमोशनल इवेंट्स को भी फॉलो कर रही हूँ , बहुत ही जबरदस्त तरीके से ऑनलाइन प्रोमोशंस हुए है वोकल फॉर लोकल थीम को लेकर , OTT पर गुलाबो सीताबो क बाद सबसे बड़ी realese यही रही।


वैसे जब 2020 की अमृता का फ़िल्मी थप्पड़ लोगों को रास नहीं आया तो 1934 से दुनिया के बने बनाये गणित से उलझती और खुद अपने जीवन के जोड़ घटा करती शकुंतला देवी लोगों को कितनी रास आएगी ये देखने वाली बात है।


और जाते जाते बस इतना की " हर माँ यही चाहती है की उसकी बेटी सिर्फ और सिर्फ एक माँ की तरह ना देखे कभी कभी जीनियस की तरह भी देख लिया करे "


Celebrate the genius in moms !!


माँ को इंसान ही रहने देते हैं, क्यूंकि देवी बनाकर उस देवी का मानमर्दन बहुत हो चूका। माँ को भी गलतियां करने का हक़ है, उसके भी अपने सपने हैं। मैं तो पूछ रही हूँ अपनी माँ से की उनके क्या सपने हैं, आप पूछिए और लिखिए यहाँ और हो सके तो बढ़वाए उनके कदम उनके सपनों की ओर :)



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