• Pooja Jain

शर्मिष्ठा

Updated: Jul 17, 2020

..कुरु वंश की आदि विद्रोहिणी


इतिहास का वो किरदार जिसपर बहुत कुछ रचा जा चूका हो उसपर अपनी कल्पना का रंग चढ़ाना कितना मुश्किल या कितना आसान होता है ये तो एक लेखक ही बता सकता है।आज जिस किताब को मैं आपके समक्ष लायी हूँ वो कुछ ऐसी ही है।ये किरदार है कुरु वंशज ययाति की प्रेमिका शर्मिष्ठा। लेखिका ने एतिहसिक किरदार को लेकर उसपर समयानुकूल बदलाव और छूट के साथ इस कृति को रचा है, जिसे वो स्वयं स्वीकार करती हैं।


तो दोस्तों आज बात करते हैं Anushakti जी की पहली किताब #शर्मिष्ठा की। फेसबुक के माध्यम से बहुत समय से जुड़े होने के कारण और इनकी प्रखर लेखनी के चलते इनकी पहली किताब के इंतज़ार बाकी सब की तरह मुझे भी था। और जब #शर्मिष्ठा आयी तो क्या झूम कर आई , किताब की ऑफिसियल लांच के दिन से पहले ही #sold_out


पुस्तक मेले से किताब तो ली लेकिन एक कसक थी अणु जी से मिल न पाने की और किताब पर उनसे चंद लफ्ज़ लिखवाने की। पर शायद कोई तार जुड़े हो कि बिलिंग करवाते हुए मुझे ये दिखी और हसरत पूरी हुई ऑटोग्राफ संग फोटोग्राफ की।


किताब का पहले ही सोल्ड आउट होना अपने आप मे कथाकार की कलम और उसकी धार को बयां कर देता है। और दूसरा पहली ही बार मे उपन्यास लिखना और उस पर भी ऐतिहासिक किरदार को लेकर लेखिका का साहस दर्शाता है।


जब मैंने इस पुस्तक को खत्म किया तो सबसे पहले यही बात समझ आयी कि ना... ये लेखिका का पहला प्रयास नही है। ये कलम बहुत कुछ रच चुकी है, भले ही वो दुनिया के सामने न हो।


आप जब शर्मिष्ठा से मिलते हैं तो लगता है आप उस युग में है। उसके मनोभावों को उसके अंतर्द्वंद्व को आप खुद महसूस करते हैं।


दोस्ती में धोखा, अधूरा प्यार, राजकुमारी होते हुए भी सेविका बन जाना ,बेटे और बहू का विछोह ...कुल मिलाकर एक ऐसी स्त्री जिसने सिर्फ खोया और जिसके पास जिंदा रहने के कुछ खास कारण भी नही थे। इन सबके बावजूद शर्मिष्ठा एक पल को भी दया की पात्र नही बनती। वो एक शशक्त प्रेमिका ,माँ , दोस्त ,बहन , बेटी, राजकुमारी और कलाकार के रूप में उभरकर सामने आती है।


शार्मिष्ठा का बचपन, हस्तिनापुर के इतिहास की कड़ियों का जुड़ना, कच ,शार्मिष्ठा और देवयानी की दोस्ती ,ययाति और शार्मिष्ठा के प्रेम का चित्रण बहुत ही ज्यादा खूबसूरत है।


अलंकारिक भाषा का प्रयोग पूरे उपन्यास को और भी पठनीय बना देता है। जैसे कि ..


मस्तिष्क के तार बिल्कुल सितार से होते हैं। एक छेड़ो और बाकी सारे झनझना उठते हैं। न चाहते हुए भी वह धुन बज उठती है जो प्रिय नहीं।

ययाति पुकारते हैं। चौंककर शार्मिष्ठा झटके से घूमती है। घूमने में बाल महाराज के मुख को छूते हुए निकल गए। शार्मिष्ठा सामने ऐसे खड़ी थी जैसे चाँद अभी बादलों की ओट से निकला है।

आप कभी प्रेम में भीगे हुए महसूस रहेंगे, कभी शार्मिष्ठा की आंखों की नमी को अपनी आंखों में भर लेंगे और कभी पुरु को प्यार से पुचकार लेंगे।


किरदारों के आपसी संवाद हो या उनके मनोभाव। आप उनकी रौ में बहते हुए चले जाएंगे। पुरु के बचपन का चित्रण , उसका लालन पालन, माँ और बेटे का आपसी संवाद .. सच कहूँ तो इसमें मुझे शार्मिष्ठा के साथ अणु की छवि भी साथ दिख रही थी, या ये कह दूं कि दोनों एकाकार हो गयी थी।


जब कच देव अपनी बात कहेंगे तो आपको लगेगा कि वो आपके सम्मुख हैं और अपनी पीड़ा सुना रहे हैं। और जब देवयानी शार्मिष्ठा से किये गए छल , अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए किसी भी हद तक जाना और उसके पीछे अपने कारणों को रखती है तो आप उसके प्रति संवेदना और गुस्सा एक साथ महसूस करते हैं, खासकर जब वह शार्मिष्ठा को लेकर कहती है तुमने मेरा सब कुछ ले लिया , मेरे पास सबकुछ होकर भी कुछ नही है।


कच और देवयानी किस तरह बचपन से ही श्रेष्ठतम बनने की राह पर थे और उनकी ये राह उनको किस किस मोड़ पर ले जाती है और क्या क्या करवा देती है ये बखूबी दर्शाया गया है। हर किरदार को लेखिका ने बराबर अपना पक्ष रखने का मौका दिया है।


शार्मिष्ठा और देवयानी दोनों किरदारों को जो मजबूती लेखिका ने दी है वह काबिले तारीफ़ है। दोनों को अपने निर्णयों पर पूर्ण विश्वास है और वह सही या ग़लत जो भी है उसपर न कोई पछतावा है ना कोई ग्लानि।


कुछ पन्नो में इतिहास को बांधना जो इंद्र लोक, बृहस्पति और शुक्राचार्य से होते हुए जो पुरु तक पहुंचता है, बहुत ही जटिल कार्य था जिसे लेखिका ने सुगमता से पूर्ण किया है।


मैं लेखिका को बधाई प्रस्तुत करती हूं और उनके आगामी अनुबंधों के लिए शुभकामनाएं प्रेषित करती हूं।


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