• Pooja Jain

थप्पड़



Taapsee Pannu शुक्रिया एक जोरदार थप्पड़ के लिए....


ये फ़िल्म नही है ये वो सच है जिसको हम देखना नही चाहते...


मैं ड्राइविंग सीखना चाहती हूँ (पत्नी)


पहले परांठे बनाने तो सीख लो.....(पति)


ये बोलकर पति निश्चिन्त हो जाता है, लेकिन पत्नी को कहां तक भेदता होगा ये शायद समझने की जरूरत किसी ने नही समझी....ये सिर्फ एक बानगी है....रोज़ ऐसी कितनी ही घटना होती होंगी.. जो बोली मज़ाक समझकर जाती है लेकिन असर बहुत गहरा करती हैं.....


जब #थप्पड़ का ट्रेलर देखा था तो उसी दिन सोच बैठी थी कि हो न हो ये फ़िल्म थिएटर में ही देखनी चाहिए.. पर जो सोच लो वैसा हो ये जरूरी नही.. नही देख पाई थी तब। लेकिन जिस दिन पता चला कि ये प्राइम पर आ रही है तो मिस करने का सवाल ही नही बनता था।


ये फ़िल्म देखी गयी और सीन दर सीन मैं उसमे डूबती गयी। चाहे रोज़ अमु का ब्लैक टी में अदरक डालना हो , सास का ब्लड शुगर नापना हो या पति को वॉलेट और फ्लास्क देना और कुछ देर अपने लिए जो तुम करती हो वो होता है एक पड़ोसी की बेटी को डांस सिखाना।


पति जब कहता है कि तुम्हारा "प्रिंटर" या "इंटरनेट" नही चल रहा तो एक अदद पत्नी की तरह उसको दुरुस्त करना और लंदन शिफ्ट होने के और अपने नीले दरवाज़े के सपने देखना और रात भर पति के साथ जागकर उसके सपनों में रंग भरना.. सुबह फिर वही रूटीन लेकिन न अमु को उस रूटीन जिंदगी से कोई दिक्कत है ना शिकायत तब भी नही जब सास ये पूछती है कि उसका बेटा ठीक से सोया जबकि अमु भी उसके साथ जागी थी , तब भी नही जब पति अपनी और से 40 लोगों को अपनी सक्सेस पार्टी के लिए न्योता दे देता है और अमु तुम जी जान से उसकी तैयारी करती हो और पार्टी में मनभरकर डांस करती हो , क्योंकि हाउस वाइफ बनना तुम्हारी चॉइस थी और अमु खुश थी...


लेकिन जब आफिस पॉलिटिक्स के चलते जब पति को उसका मनचाहा प्रोमोशन नही मिलता तो बीच पार्टी में अपने साथ काम करने वाले से वह झगड़ा करता है और जब अमु छुड़ाने की कोशिश करती है तो वह उसको थप्पड़ मार देता है... बीच पार्टी में सबके सामने।


पर ये थप्पड़ चेहरे पर नही आत्मसम्मान पर लगता है जो अमु को विचलित करता है बेचैन करता है। अगर हम आस पास देखने लगे तो ऐसी बहुत से अमु मिलेंगी.. जो रिश्ते बचाने के लिए जाने कितने "थप्पड़" सहन करती होंगी। क्योंकि ये ज्ञान तो लड़कियो को घुट्टी में मिला है कि औरत को सहन करना पड़ता है, माँ ये ज्ञान बेटी को देती है , माँ को ये ज्ञान नानी से मिला होता है और उनको उनकी माँ से... कितना सच है ये, ये तो फिल्मी कतई नही है और यह दिखाता है कितनी आसानी से एक औरत चाहे वो माँ ही हो ये सोच आगे बढ़ाती हैं क्योंकि उसने सब सहन किया है उसने समझौते किए तो आने वाली पीढ़ी भी करे...


तो जब अमु इस घुटन को सहन नही कर पाती , पार्टी के बाद पूरी रात उसका घर समेटना उसकी बेबसी उसका अबोला इसका सबूत हैं और आपको देखते हुए अंदर तक भेदता है....जब वो आत्मसम्मान के लिए डाइवोर्स फ़ाइल करती है तो उसकी वकील भी उसको यही कहती है कि बस एक थप्पड़ , " are you sure "... एक बार फिर सोच लो ये इतना आसान नही होगा , हर रिश्ते को जोड़कर रखना पड़ता है तो अमु ये कहती है कि "जोड़कर रखना पड़े मतलब कहीं न कहीं से टूटा हुआ है" ...

" हाँ, सिर्फ एक थप्पड़ .. लेकिन नही मार सकता..."

ये फ़िल्म सिर्फ अमु की कहानी नही है , ये कहानी है एक हाउस हेल्प की जिसका पति उसको रोज़ मारता है...


ये कहानी है उस जानी मानी वकील की जिसका एक अलग रूतबा है लेकिन उसका पति उसको ये जताता है कि ये सिर्फ उसके और उसके पिता जी की वजह से है...


ये कहानी है उस 13 साल की लड़की की जो अपनी माँ से पार्टी से आने के बाद ये पूछती है कि क्या पापा ने आपको कभी मारा था और साथ ही अपनी विधवा माँ को दोबारा खुश होते देखने के लिए उसके लिए रिश्ते भी देखती है...


अमु की सास हो , माँ हो या होने वाली भाभी.. सब कही न कही पित्र सत्तात्मक की सोच से त्रस्त दिखाई दी, और अमु का निर्णय कैसे इन सभी की जिंदगी में बदलाव लाता है ये देखना होगा....


इस सबमे एक किरदार और है जिसने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया अमु के पिता, बिल्कुल उसी तरह चाय बनाना, बेटी का दुख देखकर बीमार पड़ना और भी बहुत कुछ...


पति का वकील जब पेटिशन में उल्टे सीधे आरोप लगाता है तो अमु की वकील उससे पूछती है "do you still want to play fair"... तब भी अमु का अपने निर्णय पर अडिग रहना उसका स्ट्रांग होने का परिचय देता है...


अपने निर्णयों पर अडिग रहते हुए ,अपनी शर्तों पर , प्रेग्नेंट होते हुए हियरिंग पर खुद ड्राइव करते हुए जाना अमु की आत्मनिर्भरता का प्रतीक है.


कैसे एक ओवर अम्बिशस पति अपनी पत्नी को एक दायरे में बांधने की कोशिश करता है ये बखूबी दिखाया गया है.


डायलॉग्स , एक्टिंग , म्यूजिक सब जानदार। अमु की कहानी के साथ बाकी कहानियां कहीं भी फीकी नही पड़ती और बखूबी अपना मैसेज देती हैं। अमु के अलावा जिस किरदार ने दिल जीत लिया वो है वकील साहिबा नेत्रा जयसिंह ने..


ये सिर्फ फ़िल्म नहीं है ये समाज का आईना है कि चाहे हाउस हेल्प हो, वकील हो, अच्छा कमाने वाली सक्षम महिला हो या आम गृहणी... कोई भी इस स्थिति से बच नही पाया, आप क्या हो ये नही आप औरत हो सिर्फ इतना भर काफी है या तो शिकायतों का पुलिंदा या समझाइशों का पुलिंदा खुलने के लिए खासकर जब वो खुद अपने लिए निर्णय लेना चाहती है.....


फिल्में आती जाती रहती हैं लेकिन जो फ़िल्म समाज का आईना हो वो जरूर देखी जानी चाहिए... अमिताभ जी और अक्षय जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ जब #पिंक और #नाम_शबाना में अपनी छाप छोड़ती है तापसी तो उनकी अभिनय क्षमता पर सवाल नही उठता...और एक बार फिर उन्होंने इस फ़िल्म में अपना जलवा बिखेरा है एक अजीब से हुक उठाई है और सिर्फ इसी उम्मीद के साथ कि इस थप्पड़ की गूंज दूर तक जानी चाहिए मैंने लिखा है...


"...Decision तो हम सही ही सोचकर लेते हैं, सही गलत का पता तो बाद में चलता है, लेकिन अगर दिल से निकला है तो सही ही होगा...."

चाहे सारी दुनिया खिलाफ हो लेकिन एक बेटी का पता हमेशा उसके साथ होता है..थैंक्यू Kumud Mishra जी.. you were awesome!




Dia Mirza you were the cool breeze amongst all...


Love you all... And a special hug to Tapsee..


A tight slap on patriarchy....#Thappad



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